UP Revenue Code Section 24 & 116: Land Demarcation & Partition
Comprehensive guide on UP Revenue Code 2006 Sections 24 and 116 for land demarcation (paimayish) and partition disputes in Prayagraj revenue courts.
विवाद का स्वरूप और विधिक स्थिति (Core Legal Problem & Statutory Framework)
उत्तर प्रदेश के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में पैतृक भूमि या कृषि भूमि के बंटवारे और सीमांकन (सीमा निर्धारण) को लेकर उत्पन्न होने वाले विवाद अत्यधिक जटिल और तनावपूर्ण होते हैं। जब सह-खातेदार अपनी संयुक्त भूमि (Joint Khata) के विभाजन की मांग करते हैं या खेतों की गलत मेड़बंदी के कारण अवैध कब्जा कर लिया जाता है, तब उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 (UP Revenue Code 2006) की धारा 116 (Partition - भूमि का विभाजन) और धारा 24 (Demarcation - सीमांकन/पैमाइश) के तहत कानूनी उपाय अपनाए जाते हैं। यदि आपकी कृषि भूमि का सही बंटवारा नहीं हो पा रहा है या लेखपाल और अमीन की मिलीभगत से पैमाइश रिपोर्ट में हेरफेर की गई है, तो आपका पहला कानूनी कदम उपजिलाधिकारी (SDM) या तहसीलदार की अदालत में निर्धारित फॉर्म पर विधिवत वाद योजित करना है।
धारा 116 के अंतर्गत कोई भी सह-खातेदार अपनी अंश (Share) के अनुसार पृथक जोत (Separate Holding) प्राप्त करने के लिए तहसीलदार के समक्ष वाद दायर कर सकता है। इसमें सभी सह-खातेदारों को पक्षकार बनाना अनिवार्य होता है। वहीं, धारा 24 के तहत सीमांकन के लिए ऑनलाइन आवेदन करना होता है, जिस पर राजस्व निरीक्षक (कानूनगो) और लेखपाल द्वारा पैमाइश की जाती है। इस प्रक्रिया में क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) का विशेष ध्यान रखना होता है; क्योंकि गलत फोरम पर याचिका दायर करने से महीनों की मेहनत और धन व्यर्थ हो जाता है। बोर्ड ऑफ राजस्व (Board of Revenue, Uttar Pradesh, Prayagraj) इन मामलों में सर्वोच्च अपीलीय और पुनरीक्षण (Revision) प्राधिकारी है, जहां निचली अदालतों के आदेशों को चुनौती दी जाती है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट व कचहरी की जमीनी हकीकत (Ground Reality, Hidden Truth & Procedural Pitfalls)
प्रयागराज स्थित राजस्व परिषद (Board of Revenue) और जिले की तहसील अदालतों (जैसे सदर, फूलपुर, हंडिया, बारा, करछना) में राजस्व वादों की जमीनी हकीकत कागजी प्रावधानों से काफी भिन्न होती है। धारा 24 के तहत पैमाइश का आदेश होने के बावजूद जमीनी स्तर पर लेखपालों और राजस्व निरीक्षकों की सुस्ती या स्थानीय दबाव के कारण पaimayish रिपोर्ट समय पर दाखिल नहीं होती। कई मामलों में नक्शा दुरुस्ती (Correction of Map / Map Revision) न होने के कारण पैमाइश गलत साबित हो जाती है, जिससे सिविल कोर्ट और राजस्व न्यायालयों के बीच क्षेत्राधिकार का संघर्ष शुरू हो जाता है।
धारा 116 के तहत बंटवारे के मुकदमे में 'कुरा' (Kurra - विभाजन प्रस्ताव) तैयार करने के चरण में बिचौलियों और बाहरी तत्वों का हस्तक्षेप आम बात है। वकीलों के चैंबर के बाहर सक्रिय रहने वाले कुछ अनधिकृत दलाल (Touts) मुवक्किलों को 'पक्का स्टे' या जल्द फैसले का झांसा देकर गुमराह करते हैं, जिनसे बचना अनिवार्य है। इसके अलावा, बोर्ड ऑफ राजस्व Prayagraj में रिवीजन या अपील दाखिल करते समय फाइलिंग के दौरान मिलने वाली रिपोर्टिंग आपत्तियों (Defects) को समय पर दूर न करने से मामलों में भारी विलंब होता है। वादियों को यह समझना चाहिए कि राजस्व वादों में स्थगन (Stay Order) प्राप्त करना केवल अंतरिम राहत है, अंतिम न्याय के लिए साक्ष्यों और जोत चकबंदी इतिहास (Consolidation History) का मजबूत होना आवश्यक है।
चरणबद्ध कानूनी प्रक्रिया और कार्ययोजना (Step-by-Step Procedural Roadmap & Action Plan)
राजस्व मामलों में सफलता प्राप्त करने के लिए एक अचूक और समयबद्ध कार्ययोजना की आवश्यकता होती है:
- प्रथम चरण (दस्तावेजी सत्यापन): विवादित भूमि की नवीनतम खसरा, खतौनी (Form P-6), और मूल खतौनी का मिलान करें। पुराना शजरा (Village Map) और अधिकार अभिलेख (Record of Rights) प्राप्त करें।
- द्वितीय चरण (वाद योजित करना): यदि बंटवारा चाहिए तो धारा 116 के तहत तहसीलदार के न्यायालय में वाद दायर करें। यदि मेड़ या सीमा का विवाद है, तो धारा 24 के अंतर्गत निर्धारित शुल्क जमा कर ऑनलाइन पैमाइश आवेदन प्रस्तुत करें।
- तृतीय चरण (नोटिस और आपत्ति): अदालत द्वारा जारी नोटिस सभी सह-खातेदारों या विपक्षीगण को तामील कराए जाएं। विपक्षी को अपनी आपत्ति (Written Statement) दाखिल करने का अवसर मिलता है।
- चतुर्थ चरण (मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्य): पैमाइश के मामले में कानूनगो और अमीन की रिपोर्ट पर आपत्ति (Objection to Commissioner Report) दाखिल करें और आवश्यकतानुसार जिरह (Cross-Examination) कराएं।
- पंचम चरण (अपील व निगरानी): उपजिलाधिकारी या अपर कलेक्टर के आदेश से असंतुष्ट होने की स्थिति में कमिश्नर कोर्ट या बोर्ड ऑफ राजस्व Prayagraj के समक्ष अपील (Appeal) या निगरानी (Revision) दायर करें।
आवश्यक दस्तावेज और साक्ष्य जुटाने की रणनीति (Essential Documents, Evidence & Filing Checklist)
न्यायालय में मजबूत पक्ष रखने के लिए निम्नलिखित दस्तावेजों की संचिका तैयार करना अनिवार्य है:
- कम्प्यूटरीकृत खतौनी (Computerized Khatoni) पिछले 12 वर्षों की, जिसमें वंशावली (Family Tree) स्पष्ट हो।
- ग्राम पंचायत का खसरा नक्शा (Field Map / Shajra) और चकबंदी आकार पत्र (CH-41 व CH-45 यदि चकबंदी लागू रही हो)।
- तहसील रसीद, दाखिल-खारिज (Mutation) आदेश की प्रमाणित प्रति।
- यदि कोई पूर्व में आपसी समझौता या रजिस्टर्ड/अरजिस्टर्ड बंटवारानामा (Partition Deed) हुआ हो, तो उसकी प्रति।
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) के प्रावधानों के अनुरूप मौके की रंगीन फोटोग्राफ या वीडियो रिकॉर्डिंग (यदि अवैध कब्जा या निर्माण किया गया हो)।
- राजस्व निरीक्षक या अमीन की पैमाइश रिपोर्ट और नजरी नक्शा (Spot Inspection Memo)।
अदालती खर्चे, वकालत फीस और पारदर्शी व्यवस्था (Litigation Costs, Advocate Fees & Transparency)
इलाहाबाद हाईकोर्ट, बोर्ड ऑफ राजस्व और प्रयागराज जिला/तहसील अदालतों में मुकदमेबाजी के वित्तीय पहलुओं को पारदर्शी तरीके से समझना हर वादी का अधिकार है:
- वकालत फीस (Professional Fees): ड्राफ्टिंग, फाइलिंग और प्रति सुनवाई के हिसाब से फीस तय होती है। धारा 116 जैसे लंबे चलने वाले टाईटिल और पार्टीशन मुकदमों में चरण-दर-चरण (Stage-wise) या संपूर्ण पैकेज पर सहमति बनाई जाती है।
- न्यायालय शुल्क व स्टाम्प (Court Fees & Stamps): उत्तर प्रदेश कोर्ट फीस एक्ट के अनुसार निश्चित या मूल्यांकन आधारित कोर्ट फीस जमा करनी होती है। इसके अलावा कल्याणकारी टिकट (Welfare Stamps), मुंशी खर्च (Clerkage), और पेपर-बुक छपाई का खर्च शामिल होता है।
- नकल और पैमाइश शुल्क (Copy & Demarcation Charges): सरकारी चालान के माध्यम से पैमाइश शुल्क (Demarcation Fee) और प्रमाणित प्रतिलिपि (Certified Copy) के लिए निर्धारित शुल्क सरकारी खाते में जमा किया जाता है।
- वित्तीय स्पष्टता: वकालतनामा (Vakalatnama) निष्पादित करते समय ही स्पष्ट कर लें कि देय फीस में अंतरिम प्रार्थना पत्र (Interim Applications), स्टे एक्सटेंशन, या आपत्ति दाखिल करने का शुल्क शामिल है या नहीं। हमेशा भुगतान की रसीद (Fee Receipt) प्राप्त करें। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और महिलाएं विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA Prayagraj या HCLSC) के माध्यम से मुफ्त कानूनी सहायता (Free Legal Aid) का लाभ उठा सकते हैं।
Frequently Asked Questions (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
1. धारा 24 के तहत पैमाइश के लिए आवेदन करने के बाद तहसील स्तर पर अत्यधिक विलंब क्यों होता है?
धारा 24 के अंतर्गत आवेदन के बाद कानूनगो और लेखपाल द्वारा पैमाइश की तिथि निर्धारित की जाती है। अमूमन कर्मचारियों की व्यस्तता, नाप के उपकरणों की कमी या राजनीतिक दबाव के कारण फाइलें अटक जाती हैं। ऐसे में निर्धारित समयसीमा (साधारणतया 45 से 60 दिन) बीत जाने पर उच्च अधिकारियों या उपजिलाधिकारी के समक्ष प्रत्यावेदन देकर शीघ्र निस्तारण का आदेश पारित कराया जा सकता है।
2. क्या धारा 116 के तहत बंटवारे के मुकदमे में मौखिक समझौते को आधार बनाया जा सकता है?
नहीं, राजस्व न्यायालय लिखित दस्तावेजों, खतौनी के अंश और रजिस्टर्ड विलेखों पर आधारित साक्ष्यों को ही मान्यता देते हैं। मौखिक समझौतों का राजस्व अभिलेखों में तब तक कोई कानूनी मूल्य नहीं होता जब तक उन्हें सक्षम प्राधिकारी के समक्ष दर्ज या प्रमाणित न कराया गया हो।
3. बोर्ड ऑफ राजस्व Prayagraj में रिवीजन दाखिल करने की समयसीमा क्या है?
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के तहत अधीनस्थ न्यायालय के अंतिम आदेश के विरुद्ध बोर्ड ऑफ राजस्व में निगरानी (Revision) या अपील नियत समयसीमा के भीतर दाखिल करनी होती है। आमतौर पर आदेश की तिथि से 90 दिनों के भीतर अपील और नियमानुसार निगरानी दायर की जाती है, साथ ही विलंब होने पर धारा 5 लिमिटेशन एक्ट के तहत क्षमादान प्रार्थना पत्र देना पड़ता है।
4. यदि पैमाइश रिपोर्ट गलत या पक्षपातपूर्ण हो, तो उस पर रोक कैसे लग-वाई जाए?
राजस्व निरीक्षक (कानूनगो) द्वारा प्रस्तुत पैमाइश रिपोर्ट के खिलाफ आपको एक निश्चित समयावधि के भीतर संबंधित उपजिलाधिकारी (SDM) की अदालत में लिखित आपत्ति (Objection) दाखिल करनी होगी। आप अदालत से यह मांग कर सकते हैं कि रिपोर्ट को खारिज कर पुनः निष्पक्ष पैमाइश के लिए नए अमीन आयोग (Commission) का गठन किया जाए।
5. क्या सह-खातेदार अपनी मर्जी से संयुक्त जमीन के किसी खास हिस्से को बेच सकता है?
कानूनी रूप से जब तक भूमि का औपचारिक बंटवारा (Partition) धारा 116 के तहत नहीं हो जाता और प्रत्येक सह-खातेदार का हिस्सा निश्चित नहीं हो जाता, तब तक कोई भी सह-खातेदार अपने विशिष्ट भू-भाग पर मालिकाना हक जताते हुए पक्के निर्माण या बिक्री का दावा नहीं कर सकता। हालांकि, वह अपने कुल अंश (Share) भर की सीमा तक ही भूमि हस्तांतरित कर सकता है, जो बाद में बंटवारे के अधीन होता है।
